Bhagavad Gita
6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।6.29।।
sarva-bhūta-stham ātmānaṁ sarva-bhūtāni chātmani
īkṣhate yoga-yuktātmā sarvatra sama-darśhanaḥ
Word Meanings
| Word | Meaning |
|---|---|
| sarva-bhūta-stham | situated in all living beings |
| ātmānam | Supreme Soul |
| sarva | all |
| bhūtāni | living beings |
| cha | and |
| ātmani | in God |
| īkṣhate | sees |
| yoga-yukta-ātmā | one united in consciousness with God |
| sarvatra | everywhere |
| sama-darśhanaḥ | equal vision |
Translation
।।6.29।। सब जगह अपने स्वरूपको देखनेवाला और ध्यानयोगसे युक्त अन्तःकरणवाला योगा अपने स्वरूपको सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपमें देखता है।
Commentary
।।6.29।। व्याख्या--'ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः'--सब जगह एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। जैसे मनुष्य खाँड़से बने हुए अनेक तरहके खिलौनोंके नाम, रूप, आकृति आदि भिन्न-भिन्न होनेपर भी उनमें समानरूपसे एक खाँड़को, लोहेसे बने हुए अनेक तरहके अस्त्र-शस्त्रोंमें एक लोहेको, मिट्टीसे बने हुए अनेक तरहके बर्तनोंमें एक मिट्टीको और सोनेसे बने हुए आभूषणोंमें एक सोनेको ही देखता है, ऐसे ही ध्यानयोगी तरह-तरहकी वस्तु, व्यक्ति आदिमें समरूपसे एक अपने स्वरूपको ही देखता है।