Bhagavad Gita
12.2
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।12.2।।
śhrī-bhagavān uvācha
mayy āveśhya mano ye māṁ nitya-yuktā upāsate
śhraddhayā parayopetās te me yuktatamā matāḥ
◆
Word Meanings
| Word | Meaning |
|---|---|
| śhrī-bhagavān uvācha | the Blessed Lord said |
| mayi | on me |
| āveśhya | fix |
| manaḥ | the mind |
| ye | those |
| mām | me |
| nitya yuktāḥ | always engaged |
| upāsate | worship |
| śhraddhayā | with faith |
| parayā | best |
| upetāḥ | endowed |
| te | they |
| me | by me |
| yukta-tamāḥ | situated highest in Yog |
| matāḥ | I consider |
Translation
।।12.2।।मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
Commentary
।।12.2।। व्याख्या--[भगवान्ने ठीक यही निर्णय अर्जुनके बिना पूछे ही छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें दे दिया था। परन्तु उस विषयमें अपना प्रश्न न होनेके कारण अर्जुन उस निर्णयको पकड़ नहीं पाये। कारण कि स्वयंका प्रश्न न होनेसे सुनी हुई बात भी प्रायः लक्ष्यमें नहीं आती। इसलिये उन्होंने इस अध्यायके पहले श्लोकमें ऐसा प्रश्न किया।