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ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।

 

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

।।3.31।। जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।
Bhagavad Gita 3.31
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