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प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।

 

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

।।3.29।। प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे।
Bhagavad Gita 3.29
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