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त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

 

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्

।।2.45।। वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा।  
Bhagavad Gita 2.45
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