Bhagavad Gita

14.22

श्री भगवानुवाचप्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।14.22।।

śhrī-bhagavān uvācha
prakāśhaṁ cha pravṛittiṁ cha moham eva cha pāṇḍava
na dveṣhṭi sampravṛittāni na nivṛittāni kāṅkṣhati

Word Meanings

Word Meaning
śhrī-bhagavān uvācha the Supreme Divine Personality said
prakāśham illumination
cha and
pravṛittim activity
cha and
moham delusion
eva even
cha and
pāṇḍava Arjun, the son of Pandu
na dveṣhṭi do not hate
sampravṛittāni when present
na nor
nivṛittāni when absent
kāṅkṣhati longs

Translation

।।14.22।।श्रीभगवान् बोले -- हे पाण्डव ! प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह -- ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता, और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।

Commentary

।।14.22।। व्याख्या --   प्रकाशं च -- इन्द्रियों और अन्तःकरणकी स्वच्छता? निर्मलताका नाम प्रकाश है। तात्पर्य है कि जिससे इन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि पाँचों विषयोंका स्पष्टतया ज्ञान होता है? मनसे मनन होता है और बुद्धिसे निर्णय होता है? उसका नाम प्रकाश है।भगवान्ने पहले (14। 11 में ) सत्त्वगुणकी दो वृत्तियाँ बतायी थीं -- प्रकाश और ज्ञान। उनमेंसे यहाँ केवल प्रकाशवृत्ति लेनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणमें प्रकाशवृत्ति ही मुख्य है क्योंकि जबतक इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें प्रकाश नहीं आता? स्वच्छतानिर्मलता नहीं आती? तबतक ज्ञान (विवेक) जाग्रत् नहीं होता। प्रकाशके आनेपर ही ज्ञान जाग्रत् होता है। अतः यहाँ ज्ञानवृत्तिको प्रकाशके ही अन्तर्गत ले लेना चाहिये।प्रवृत्तिं च -- जबतक गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक रजोगुणकी लोभ? प्रवृत्ति? रागपूर्वक कर्मोंका आरम्भ? अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती रहती हैं। परन्तु जब मनुष्य गुणातीत हो जाता है? तब रजोगुणके साथ तादात्म्य रखनेवाली वृत्तियाँ तो पैदा हो ही नहीं सकतीं? पर आसक्ति? कामनासे रहित प्रवृत्ति (क्रियाशीलता) रहती है। यह प्रवृत्ति दोषी नहीं है। गुणातीत मनुष्यके द्वारा भी क्रियाएँ होती हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ केवल प्रवृत्ति को ही लिया है।रजोगुणके दो रूप हैं -- राग और क्रिया। इनमेंसे राग तो दुःखोंका कारण है। यह राग गुणातीतमें नहीं रहता। परन्तु जबतक गुणातीत मनुष्यका दीखनेवाला शरीर रहता है? तबतक उसके द्वारा निष्कामभावपूर्वक स्वतः क्रियाएँ होती रहती हैं। इसी क्रियाशीलताको भगवान्ने यहाँ प्रवृत्ति नामसे कहा है।मोहमेव च पाण्डव -- मोह दो प्रकारका है -- (1) नित्यअनित्य? सत्असत्? कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक न होना और (2) व्यवहारमें भूल होना। गुणातीत महापुरुषमें पहले प्रकारका मोह (सत्असत् आदिका विवेक न होना) तो होता ही नहीं (गीता 4। 35)। परन्तु व्यवहारमें भूल होना अर्थात् किसीके कहनेसे किसी निर्दोष व्यक्तिको दोषी मान लेना और दोषी व्यक्तिको निर्दोष मान लेना आदि तथा रस्सीमें साँप दीख जाना? मृगतृष्णामें जल दीख जाना? सीपी और अभ्रकमें चाँदीका भ्रम हो जाना आदि मोह तो गुणातीत मनुष्यमें भी होता है।न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति -- सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश? रजोगुणका कार्य प्रवृत्ति और तमोगुणका कार्य मोह -- इन तीनोंके अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी गुणातीत महापुरुष इनसे द्वेष नहीं करता और इनके निवृत्त होनेपर भी इनकी इच्छा नहीं करता। तात्पर्य है कि ऐसी वृत्तियाँ क्यों उत्पन्न हो रही हैं? इनमेंसे कोईसी भी वृत्ति न रहे -- ऐसा द्वेष नहीं करता और ये वृत्तियाँ पुनः आ जायँ ये वृत्तियाँ बनी रहें -- ऐसा राग नहीं करता। गुणातीत होनेके कारण गुणोंकी वृत्तियोंके आनेजानेसे उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। वह इन वृत्तियोंसे स्वाभाविक ही निर्लिप्त रहता है।विशेष बातएक तो वृत्तियोंका होना होता है और एक वृत्तियोंको करना (उनमें सम्बन्ध जोड़ना अर्थात् रागद्वेष करना) होता है। होने और करनेमें बड़ा अन्तर है। होना समष्टिगत होता है और करना व्यक्तिगत होता है। संसारमें जो होता है? उसकी जिम्मेवारी हमारेपर नहीं होती। जो हम करते हैं? उसीकी जिम्मेवारी हमारेपर होती है।जिस समष्टि शक्तिसे संसारमात्रका संचालन होता है? उसी शक्तिसे हमारे शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि(जो कि संसारके ही अंश हैं) का भी संचालन होता है। जब संसारमें होनेवाली क्रियाओंके गुणदोष हमें नहीं लगते? तब शरीरादिमें होनेवाली क्रियाओंके गुणदोष हमें लग ही कैसे सकते हैं परन्तु जब स्वतः होनेवाली क्रियाओंमेंसे कुछ क्रियाओँके साथ मनुष्य रागद्वेषपूर्वक अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् उनका कर्ता बन जाता है? तब उनका फल उसको ही भोगना पड़ता है। इसलिये अन्तःकरणमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंसे होनेवाली अच्छीबुरी वृत्तियोंसे साधकको रागद्वेष नहीं करना चाहिये अर्थात् उनसे अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये।वृत्तियाँ एक समान किसीकी भी नहीं रहतीं। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुषके अन्तःकरणमें भी होती हैं? पर उसका उन वृत्तियोंसे रागद्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ आपसेआप आती और चली जाती हैं। गुणातीत महापुरुषकी दृष्टि उधर जाती ही नहीं क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय और कुछ रहता ही नहीं।देखना और दीखना -- दोनोंमें बड़ा फरक है। देखना करने के अन्तर्गत होता है और दीखना होने के अन्तर्गत होता है। दोष देखनेमें होता है? दीखनेमें नहीं। अतः साधकको यदि अन्तःकरणमें खराबसेखराब वृत्ति भी दीख जाय? तो भी उसको घबराना नहीं चाहिये। अपनेआप दीखनेवाली (होनेवाली) वृत्तियोंसे रागद्वेष करना अर्थात् उनके अनुसार अपनी स्थिति मानना ही उनको देखना है। साधकसे भूल यही होती है कि वह दीखनेवाली वस्तुको देखने लग जाता है और फँस जाता है। भगवान् राम कहते हैं -- सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक।। (मानस 7। 41)साधकको गहराईसे विचार करना चाहिये कि वृत्तियाँ तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं? पर स्वयं (अपना स्वरूप) सदा ज्योंकात्यों रहता है। वृत्तियोंमें होनेवाले परिवर्तनको देखनेवाला स्वरूप परिवर्तनरहित है। कारण कि परिवर्तनशीलको परिवर्तनशील नहीं देख सकता? प्रत्युत परिवर्तनरहित ही परिवर्तनशीलको देख सकता है। इससे सिद्ध होता है कि स्वरूप वृत्तियोंसे अलग है। परिवर्तनशील गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ अपनेमें प्रतीत होती हैं। अतः साधकको आनेजाने वाली वृत्तियोंके साथ मिलकर अपने वास्तविक स्वरूपसे विचलित नहीं होना चाहिये। चाहे जैसे वृत्तियाँ आयें? उनसे राजीनाराज नहीं होना चाहिये उनके साथ अपनी एकता नहीं माननी चाहिये। सदा एकरस रहनेवाले गुणोंसे सर्वथा निर्लिप्त? निर्विकार एवं अविनाशी अपने स्वरूपको न देखकर परिवर्तनशील? विकारी एवं विनाशी वृत्तियोंको देखना साधकके लिये महान् बाधक है।